ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया : 15 वर्षों के शोध से उपजी साहिर की अनूठी गाथा


साहिर लुधियानवी पर लिखी एक खास किताब — ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया
ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया / राजेश बादल

पुस्तक ‘ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया’ हिंदी सिनेमा और उर्दू-हिंदी साहित्य के उस महान इंक़लाबी और रूमानी शायर का रूहानी सफरनामा है जिसे पूरी दुनिया साहिर लुधियानवी के नाम से जानती है। मंजुल पब्लिशिंग हाउस द्वारा प्रकाशित 384 पृष्ठों की इस शानदार और शोधपरक पुस्तक को टीवी के जाने-माने बायोपिक निर्माता, निर्देशक और वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने लिखा है। यह पुस्तक एक ऐसे बच्चे अब्दुल हई की दास्तान है, जिसका असली नाम तो हममें से बहुत से लोग आज भी नहीं जानते, लेकिन बाद में यही बच्चा अपनी बेबाक शायरी के दम पर शब्दों का ऐसा जादूगर बन बैठा कि जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है।

राजेश बादल की यह पुस्तक हमें साहिर की ज़िंदगी के उन गुमनाम पन्नों तक ले जाती है, जो अब तक आम जनता की नज़रों से पूरी तरह ओझल थे। अब्दुल हई (साहिर) का जन्म गोरी हुकूमत के एक वफ़ादार और रईस सामंत के घर हुआ था। पिता की बारहवीं बीवी से जन्मा यह बच्चा शायद गुमनामी और अशिक्षा के अंधेरे में ही खो जाता, क्योंकि उसके पिता उसे जानबूझकर अनपढ़ बनाए रखना चाहते थे। लेकिन उसकी माँ ने सामाजिक बेड़ियों से बगावत कर दी। शौहर की बेहिसाब दौलत को एक झटके में ठोकर मारकर वह अपने बच्चे को लेकर घर से निकल गई। मामला अदालत की चौखट तक पहुँचा और अंततः एक माँ के अटूट हौसले की जीत हुई। उसने अपने बचे-खुचे ज़ेवर बेचकर बेटे को तालीम दिलाई। माँ की इसी तपस्या ने उस अनपढ़ रखे जाने वाले बच्चे को वह साहिर लुधियानवी बना दिया जिसके आगे आज पूरी दुनिया सिर झुकाती है।

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लेखक ने साहिर की शायरी के पीछे छिपी उस सुलगती हुई आग को बहुत बारीकी से पकड़ा है। साहिर के शेर, नज़्में और ग़ज़लें जहाँ हमें रुलाती हैं और हँसाती हैं, वहीं वे व्यवस्था के प्रति एक गहरे आक्रोश से भी भर देती हैं। उनके लफ़्ज़ अदब के एक ऐसे लोक में ले जाते हैं, जो नाइंसाफ़ी के विरोध में सारे संसार से टकराने का हौसला रखते हैं और सच के लिए किसी भी हद तक सत्ता की आँखों में आँखें डालने के लिए तैयार रहते हैं।

बाहर से बेहद इंक़लाबी और कड़क दिखने वाले साहिर के भीतर एक अंतहीन दर्द और सूनापन छिपा था, जिसे इस किताब ने बड़ी शिद्दत से उकेरा है। रुपहले पर्दे पर उनके लिखे गीतों पर दुनिया झूमती थी, लेकिन उनके अपने सीने में रंज ओ ग़म का एक गहरा दरिया बहता था। उनके अपने दुःख कम न थे, जिसके बारे में दुनिया कम ही जानती है। उनकी ज़िंदगी में एक के बाद एक कई महिलाएँ आईं और गईं, मगर कोई भी उनका घर नहीं बसा पाईं। उनके गीतों और ग़ज़लों में प्यार का सागर जितनी ज़ोर से हिलोरें मारता था, उनके मन के भीतर दूर-दूर तक उतना ही विकराल और खामोश रेगिस्तान पसरा हुआ था। इसी सूनेपन और अधूरे इश्क को दिल में लिए शायरी का यह बेताज सुल्तान एक दिन हमेशा के लिए इस दुनिया से चला गया।

राजेश बादल ने करीब पंद्रह वर्षों के अपने अथक और गहरे शोध के बाद साहिर का यह संपूर्ण प्रामाणिक ज़िंदगीनामा पाठकों के लिए प्रस्तुत किया है। साहिर की ज़िंदगी के क़िस्से अब तक हमें टुकड़ों-टुकड़ों में ‘आधी हक़ीक़त और आधा फ़साना’ की तरह मिलते रहे थे, और हम उन्हीं पर भरोसा करते आ रहे थे। परंतु लेखक का यह दावा इस किताब को पढ़ने के बाद पूरी तरह सच जान पड़ता है कि इससे पहले साहिर की समग्र, प्रामाणिक और पुख्ता कहानी आपने कहीं नहीं पढ़ी होगी।

साहिर लुधियानवी के कुछ खास गीत :

  1. अभी न जाओ छोड़कर…
    ​फिल्म : हम दोनों – 1961
    संगीतकार : जयदेव
    गायक : मोहम्मद रफी, आशा भोसले
  2. मैं ज़िदगी का साथ निभाता चला गया…
    फिल्म : हम दोनों – 1961
    संगीतकार : जयदेव
    गायक : मोहम्मद रफी
  3. कभी-कभी मेरे दिल में…
    फिल्म : कभी-कभी – 1976
    संगीतकार : खय्याम
    गायक : मुकेश, लता मंगेशकर
  4. जो वादा किया है वो निभाना पड़ेगा…
    फिल्म : कभी-कभी – 1976
    संगीतकार : खय्याम
    गायक : मुकेश
  5. उड़ें जब-जब जुल्फें तेरी…
    फिल्म : नया दौर – 1957
    संगीतकार : ओ.पी. नैय्यर
    गायक : मोहम्मद रफी, आशा भोसले
ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया: साहिर का प्रमाणिक ज़िंदगीनामा
रोजश बादल
पृष्ठ : 384
मंजुल पब्लिशिंग हाउस
किताब का लिंक : https://amzn.to/4uu1ALK