
17 साल तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, वर्तमान में कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ‘अपनापन’ पुस्तक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपने 35 वर्षों गहरे संबंधो से उपजे आत्मीय अनुभव साझा किए हैं।
284 पेज की इस पुस्तक को 11 अध्यायों में बंटा गया है- जो दिसंबर, 1991 की नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में निकली ऐतिहासिक एकता यात्रा से शुरू हो कर गुजरात के विकास मॉडल, नर्मदा मॉडल से होते हुए आज के समय में जन भागीदारी से विकसित होते भारत तक जाती है।
इस पुस्तक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व को जिस तरह प्रस्तुत किया गया है वह अत्यंत प्रभावशाली है। अक्सर बड़े नेताओं के बारे में लिखी गई पुस्तकों में केवल उपलब्धियों की सूची होती है लेकिन यहां लेखक ने उन छोटे-छोटे प्रसंगों को सामने रखा है जो किसी व्यक्ति के भीतर के संस्कार और सोच को उजागर करते हैं। चाहे बचपन के प्रसंग हों, संगठन के दिन हों या शासन के निर्णय, हर अध्याय में एक निरंतरता दिखाई देती है। पाठक को महसूस होता है कि यह पुस्तक सेवा को जीवन का लक्ष्य मानने की यात्रा है।

आप जब पुस्तक को पढ़ते है तो शुरुआत से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि लेखक ने इसे केवल राजनीतिक दस्तावेज की तरह नहीं लिखा। इसमें एक कार्यकर्ता का अपनापन है, एक सहयात्री का अनुभव है और एक ऐसे व्यक्ति की सच्ची अभिव्यक्ति है जिसने लंबे समय तक नेतृत्व को बहुत करीब से देखा और समझा है।
लेखक शिवराज सिंह चौहान ने कई जगह अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए हैं। उन्हें पढ़ कर यह पुस्तक पाठक को अपने आप से जोड़ लेती है ऐसे लगता है जैसे वो पुस्तक नहीं पढ़ रहा हो बल्कि किसी बड़े से उसके अनुभव सुना रहा हो। और उन भावनाओं को भी महसूस करने लगता है जिनसे लेखक स्वयं गुजरे हैं।
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पुस्तक में भारतीय संस्कृति, सेवा परंपरा और राष्ट्र भावना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। कई जगह गीता, स्वामी विवेकानंद और भारतीय चिंतन का उल्लेख पुस्तक को गहराई देता है। यह बात विशेष रूप से प्रभावित करती है कि आधुनिक शासन और भारतीय मूल्यों को साथ लेकर चलने की सोच पुस्तक में लगातार दिखाई देती है।
इसमें प्रेरणा, संवेदना, अनुभव और राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव है। अपनापन बताती है कि नेतृत्व का सबसे बड़ा आधार विश्वास और सेवा होती है।
शिवराज सिंह चौहान की भाषा हमेशा से ही सरल और सहज रही है और वही सरलता इस पुस्तक में भी दिखती है। कहीं भी अनावश्यक भारीपन नहीं है, भाषा में आत्मीयता है जिससे पुस्तक सीधे दिल तक पहुंचती है। और यही सरलता इसे विशेष बनाती है। हर आयु वर्ग के पाठक चाहें वह गांव का किसान हो या शहर का युवा पाठक इसे समझ सकता है और इससे जुड़ सकता है।

पुस्तक का प्रवाह बहुत अच्छा है। लेखक ने घटनाओं, विचारों और अनुभवों को बहुत स्वाभाविक ढंग से जोड़ा है। जिससे हर अध्याय एक से दूसरे अध्याय से जुडा हुआ यही कारण है कि लगभग तीन सौ पन्नों की यह पुस्तक पाठक को अन्त तक बांधे रखती है।
पुस्तक में प्रकाशक ने कई तस्वीर भी लगाई हैं जो इसे और जीवंत कर देती है, इसमें उपस्थित आंकड़े एवं ग्राफ इसे समझने में बेहद सहायक है।
‘अपनापन’ को उन पुस्तकों में शामिल किया जा सकता है जिन्हें केवल एक बार पढ़कर नहीं छोड़ा जा सकता बल्कि समय-समय पर फिर से पढ़ने का मन करता है और आप जब भी इसे पढ़ते है तो कुछ न कुछ नया तथ्य आपके सामने आ जाता है। यह एक ऐसी पुस्तक है जो पाठक को केवल जानकारी नहीं देती बल्कि उसे अन्दर तक छूती है।
-अनमोल दुबे
अपनापन : नरेंद्र मोदी संग मेरे अनुभव
शिवराज सिंह चौहान
पृष्ठ : 312
प्रभात प्रकाशन
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