
डॉ. ओम प्रकाश शुक्ल द्वारा लिखित उपन्यास ‘द्रोह : नियति का न्याय’ समकालीन भारतीय समाज की एक बेहद संवेदनशील और विचारोत्तेजक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसका सीधे मनुष्य के जीवन और उसके सरोकारों से जुड़े होना है। लेखक ने अपनी आत्यंतिक मानवीय चिंतन प्रक्रिया के माध्यम से एक ऐसी कथा को जन्म दिया है, जो पाठक को भीतर तक झकझोर देती है। यह उपन्यास आज के दौर के ग्रामीण जीवन, वहां के मनोविकार और आधुनिक व्यवस्था पर काबिज भ्रष्टतंत्र व दलालों के गठजोड़ का सजीव चित्रण करता है।
कथावस्तु की सबसे सशक्त बात इसका पलायनवादी समाज की मानसिक दुविधा को टटोलना है। आज भारतीय समाज में रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में लोग छोटे गाँवों से कस्बों, कस्बों से शहरों और शहरों से होते हुए महानगरों व विदेशों तक पलायन कर रहे हैं। भौतिक रूप से हम भले ही अपनी जड़ों से दूर चले जाएँ, लेकिन पुरखों की उस माटी की खुशबू और यादें जीवन भर मनुष्य को अपनी ओर खींचती रहती हैं।

लेखक डॉ. ओम प्रकाश शुक्ल ने इस पलायन के दूसरे पहलू यानी ग्रामीण मनोविज्ञान को भी बहुत बारीकी से उभारा है। जब शहर जा चुका कोई व्यक्ति अपने नए अनुभवों और प्रगतिशील विचारों के साथ दोबारा गाँव लौटने का प्रयास करता है, तो गाँव का संकुचित समाज उसे आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता। अपनों का अपनों के प्रति यह मानसिक द्रोह, ईर्ष्या और अविश्वास उपन्यास की रीढ़ है।
यह सामाजिक ताने-बाने की कहानी के साथ भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र के खिलाफ सत्य और न्याय के लिए लड़ने की एक अद्भुत संघर्ष-गाथा भी है। लेखक ने बेहद सरल, सुबोध लेकिन अत्यधिक प्रभावशाली भाषा का प्रयोग किया है। मनोवैज्ञानिक द्वंद्वों और सामाजिक विसंगतियों को एक सूत्र में पिरोकर लेखक ने इस उपन्यास की मजबूत आधारशिला रखी है।
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‘द्रोह : नियति का न्याय’ यह आश्वस्ति देती है कि जब प्रेरक और उद्देश्यपूर्ण लेखन सामाजिक व राष्ट्रीय सरोकारों के साथ सामने आता है, तो पाठक भी उसका सहर्ष स्वागत करते हैं। यदि आप आज के बदलते गाँवों, टूटते रिश्तों और समाज की वास्तविक स्थिति को गहराई से समझना चाहते हैं तो यह उपन्यास आपके लिए है।
द्रोह : नियति का न्याय
डॉ. ओम प्रकाश शुक्ल
पृष्ठ : 150
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