अपनापन : शिवराज सिंह चौहान द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ तीन दशकों के अनुभवों का संकलन


‘अपनापन’ शिवराज सिंह चौहान द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ तीन दशकों के अनुभवों का संकलन है। यह पुस्तक सेवा, अंत्योदय और राष्ट्र-निर्माण के मूलमंत्रों को दर्शाकर पाठकों को दृढ़ संकल्प, जन भागीदारी तथा लोक कल्याण की प्रेरणा देती है।

A book by Shivraj Singh Chauhan named Apnapan
शिवराज सिंह चौहान की पुस्तक ‘अपनापन’.

पुस्तक से एक अंश :

मुझे आज भी याद है, वर्ष 2023 में हरियाणा के झज्जर में एक रैली के दौरान मोदीजी ने तुरंत दीपक कुमार को पहचान लिया, जो 1990 के दशक में हरियाणा प्रदेश कार्यालय में कार्य किया करते थे। तब मोदीजी हरियाणा के प्रभारी थे और दीपकजी उनके लिए खिचड़ी, दलिया जैसा सादा भोजन बनाया करते थे। मोदीजी ने दो दशक बाद दीपकजी को न केवल पहचाना, बल्कि उनके पास जाकर गर्मजोशी से गले लगाया और दोनों के बीच पुराने दिनों को लेकर हँसी-मजाक भी हुआ। यह देखकर सब लोग हैरान रह गए। भाजपा को अकसर कार्यकर्ता-आधारित पार्टी कहा जाता है। मोदीजी ने हमें सिखाया कि इसका सच्चा अर्थ क्या है? इसके निहितार्थ को समझाने के लिए मैं यहाँ पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी के एक आदर्श वाक्य को साझा करना चाहूँगा, जो वे अकसर कहा करते थे, ‘आज का हमारा विरोधी कल का मतदाता बनेगा, कल का मतदाता, परसों का सदस्य बनेगा और परसों का सदस्य अगले दिन का सक्रिय कार्यकर्ता बनेगा।’

मतभेदों को संवाद में और संवाद को समर्पण में बदलने की इस दृष्टि को मोदीजी ने साकार किया है। यही हमारी विचारधारा की नींव है।

A book by Shivraj Singh Chauhan named Apnapan
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ शिवराज सिंह चौहान.

भाजपा के आदर्शों को समर्पित जीवन

हमारी पार्टी त्याग और विनम्रता के जल से सींची गई है। कौन भूल सकता है, अटलजी जैसे विशाल व्यक्तित्व वाले नेता पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशनों में स्वयं भोजन परोसते थे! या आडवाणीजी, जो पार्टी के दस्तावेजों के कार्य को बेहद संयम से सँभालते थे? कुशाभाऊ ठाकरेजी, राजनाथ सिंहजी, नितिन गडकरीजी, अमित शाहजी, इन सबसे एक ही संदेश मिला है कि हमारी पार्टी वंशवाद पर नहीं, परिश्रम पर टिकी है। मुझे आज भी याद है कि जब मैं बहुत छोटा था और गाँव के ही स्कूल में दूसरी या तीसरी कक्षा में पढ़ता था। तब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं और पूरे देश में हमारे साधु-संतों की अगुवाई में ‘गौवध बंद करो’ आंदोलन चल रहा था।

तब मेरा गाँव, जो नर्मदा नदी के तट पर बसा था, एक आध्यात्मिक वातावरण वाला स्थान था और वहाँ साधु-संतों का आना-जाना लगा रहता था। हमारे गाँव के पास भी एक साधु कुटिया बनाकर रहते थे और उन्हें हम ‘स्वामी जी’ कहकर पुकारते थे। एक दिन उन्होंने भी ‘गौवध बंद करो’ के नारे के साथ एक जुलूस का आयोजन किया। मैं भी उस जुलूस में भागीदार बना और मेरे बालमन में यह बात बैठ गई कि कांग्रेस के राज में गायों का वध होता है, जो हमारी संस्कृति और मूल्यों के विरुद्ध है।

उसी समय साधु-संतों ने गौवध के मुद्दे को लेकर दिल्ली में संसद् भवन के पास एक बड़ा प्रदर्शन किया, जिसमें पुलिसकर्मियों ने उन पर गोलियाँ बरसाईं। सरकार के इस कृत्य ने पूरे देश को उद्वेलित कर दिया और मेरे मन में भी कांग्रेस, उसकी विचारधारा और नीतियों के प्रति निराशा तथा असहमति का भाव बढ़ गया। मुझे विश्वास हो गया कि कांग्रेस पार्टी भारतीय मूल्यों और परंपराओं के साथ कभी भी न्याय नहीं कर सकती है। वहीं दूसरी ओर जनसंघ थी, जो न केवल इस आंदोलन का समर्थन कर रही थी, बल्कि इस माँग को लेकर सरकार का ध्यान आकर्षित करने का निरंतर प्रयास भी कर रही थी। यही कारण है कि मेरे अंतर्मन में यह भाव आया कि भारतीय जनसंघ एक ऐसा संगठन है, जिसके आदर्शों से मैं पूरी तरह सहमत हो सकता हूँ, उन्हें अपने जीवन का ध्येय बना सकता हूँ। इसी लगाव और श्रद्धा के साथ मैं जनसंघ का समर्थक बन गया।

उम्र बढ़ने के साथ मेरे मन में यह विचार आया कि जीवन में कुछ करना चाहिए। मानव जीवन निरर्थक जीने के लिए नहीं है। यह देश एवं समाज की सेवा के लिए है। हमारे गाँवों में कुछ किसान परिवार थे और कई लोग ऐसे थे, जिनके पास पर्याप्त जमीनें नहीं थीं। ऐसे में वे अपने जीवन यापन के लिए दूसरों के खेतों में मजदूरी करते थे। उस समय सवेरे 6 बजे से लेकर रात के 8-9 बजे तक खेतों में काम करना आम बात थी। मजदूरी करने वाले लोगों को मेहनताने के रूप में ‘पाई’ कहे जाने वाले एक बरतन में अनाज नापकर दिया जाता था। एक दिन का पूर्ण वेतन ढाई पाई होता था, जो निस्‍संदेह बेहद कम था। हालाँकि मैं भी किसान परिवार से था और हमारे खेतों में भी मजदूर काम करते थे। फिर भी मैं उस ढाई पाई के मेहनताने को अन्याय के रूप में देखता था। भला इतना सा अनाज एक परिवार का पेट कैसे भर सकता था? तभी मैंने निश्चय कि या कि इसके विरुद्ध लड़ना चाहिए।

मैंने गाँव के मंदिर परिसर में मजदूरों की एक बैठक बुलाई, चूँकि मेरी उम्र कम थी, शायद इसीलिए बहुत से लोग एकत्र तो नहीं हुए, लेकिन फिर भी कुछ लोग मेरी बात सुनने आए। मैंने वहाँ उपस्थित मजदूरों से कहा कि ढाई पाई मजदूरी बहुत कम है और इसे बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने मुझसे पूछा कि ‘हम इसे कैसे बढ़ा सकते हैं, हम तो मजबूर हैं; पेट भरना है तो काम करना है।’ मैंने उन सभी से आग्रह कि या कि मजदूरी बढ़ाने के लिए हम सब मिलकर आंदोलन करेंगे। मजदूर अगर खेत में काम करने से मना कर देंगे, तो हर किसान को विवश होकर हमारी माँगें माननी ही पड़ेंगी। फिर भी कुछ लोग मेरे इस सुझाव से असहमत थे। परंतु फिर हमने मिलकर यह तय किया कि मजदूरी बढ़ाने की माँग को लेकर हम जुलूस निकालेंगे। उस समय गाँव में बिजली नहीं होती थी, इसलिए हमने एक लालटेन-जिसे तब पेट्रोमैक्स के नाम से पहचाना जाता था-की व्यवस्था की। उसे जलाकर एक मजदूर ने अपने सिर पर रख लिया और एक दृढ़ निश्चय के साथ हम सभी आगे बढ़े। मैं और लगभग 25 मजदूर गाँव में नारा लगाते हुए निकले, ‘ढाई पाई नहीं, पाँच पाई लेंगे, वरना काम बंद करेंगे!’

जैसे ही जुलूस मेरे घर के दरवाजे पर पहुँचा, मैंने देखा कि मेरे चाचाजी हाथ में लाठी लिये हमारी तरफ ही आ रहे हैं, लाठी उठाकर वे बोले, ‘आओ जरा इधर, मैं देता हूँ तुम्हें पाँच पाई मजदूरी।’ उनका यह रौद्र रूप देख मेरे मजदूर भाई तो पेट्रोमैक्स को एक किनारे फेंककर भाग खड़े हुए, लेकिन मैं बच न सका। मुझ पर आरोप लगा कि मैंने मजदूरों को भड़काया है-फिर क्रोधित चाचाजी ने मुझे क्या-क्या दंड दिया, वह शायद इस किताब में समा न पाए, लेकिन इतना तो स्पष्ट था कि आंदोलन अवश्य ही नाकाम हुआ।

इसके बाद परिवार ने यह सोचकर मुझे भोपाल भेज दिया कि मैं पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहा हूँ। लेकिन इस घटना ने मेरे मन पर अमिट छाप छोड़ दी, दूसरों के बारे में सोचना, उनके लिए कुछ करना, उनके जीवन में छोटा ही सही, कोई सुधार लाना-यही परम सेवा है, जि सकी तुलना किसी और चीज से नहीं की जा सकती और यही सोच हमारी पार्टी की भी है।

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‘मतभेदों को संवाद में और संवाद को समर्पण में बदलने की इस दृष्टि को मोदीजी ने साकार किया है.’

राजनीति से परे शाश्वत सम्मान

ऐसी ही एक और घटना, जो मेरी स्मृतियों में अंकित है। दरअसल, यह वाकया है वर्ष 2014 में मोदीजी के भारत के प्रधानमंत्री बनने के बाद का, जब आनंदीबेन पटेल गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रही थीं। यह उत्साह और ऊर्जा से भरा एक भव्य आयोजन था और पदस्थ भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में मैं भी इसमें शामिल था। तभी अचानक मैंने कुछ असामान्य देखा। मोदीजी मंच पर रहने के बजाय तेजी से सीढ़ियों से उतरे और श्रोताओं की ओर बढ़े। एक क्षण के लिए लोग चकित थे कि आखिर हुआ क्या? फिर पता चला कि कार्यक्रम में गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और प्रमुख राजनीतिक स्तंभ केशुभाई पटेलजी का आगमन हुआ है। वे अब पार्टी में नहीं थे, लेकिन मोदीजी ने व्यक्तिगत तौर पर उनका स्वागत किया। बड़े सम्मान के साथ उनका हाथ पकड़ा और उन्हें मंच तक ले आए। उनके इस आत्मीय भाव ने हम सभी के हृदय को झकझोर दिया। इस घटना ने हमें याद दिलाया कि राजनीतिक मतभेद अस्थायी हैं, लेकिन मर्यादा और सम्मान शाश्वत हैं।

सम्मान की यह संस्कृति केवल पुराने कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रही। मोदीजी ने इसे चिंतकों, कर्मयोगियों और उन बुद्धिजीवियों तक भी फैलाया, जिनकी आवाज राजनीति के शोर में अकसर दब जाती है।

यहाँ मुझे स्वर्गीय श्री अनिल माधव दवेजी याद आते हैं। वे कोई पारंपरिक राजनेता नहीं थे। उनके मन और प्राण माँ नर्मदा में बसते थे। उन्होंने माँ नर्मदा की धारा, पारिस्थितिकी और संस्कृति का गहन अध्ययन किया। प्रदूषण से न केवल जल, बल्कि तटवर्ती जीवन पर क्या असर होता है, इसकी कई विस्तृत रिपोर्ट्स तैयार कीं। संघ के प्रचारक के रूप में उन्होंने वहाँ माँ नर्मदा की सेवा में अपना जीवन अर्पण कर दिया, जहाँ मीडिया की कोई चमक-दमक नहीं थी।

मोदीजी ने ही उन्हें पहचाना, याद रखा और राज्यसभा में भेजा। फिर पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का दायित्व सौंपा। उनके अनुभवों से मंत्रालय को अत्यंत लाभ हुआ। जब 2017 में दवेजी का आकस्मिक निधन हुआ, तो मुझे प्रधानमंत्रीजी का व्यक्तिगत फोन आया। उनकी आवाज भारी थी। उन्होंने कहा, ‘सुनिश्चित कीजिए कि सबकुछ उनकी (दवेजी के) इच्छानुसार ही हो।’

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शिवराज सिंह चौहान की पुस्तक ‘अपनापन’

दवेजी आजीवन अविवाहित रहे थे, उन्होंने इच्छा जताई थी कि उनकी अस्थियाँ बांद्राभान में माँ नर्मदा में ही प्रवाहित हों। मोदीजी ने दवेजी को अपना ही परिवार माना था। मोदीजी के आग्रह पर ही मैं स्वयं दवेजी की अंतिम यात्रा में शामिल हुआ और यह सुनिश्चित किया कि उनका अंतिम संस्कार उसी श्रद्धा के साथ किया जाए, जैसे उन्होंने पूरे जीवन माँ नर्मदा की सेवा की थी। निर्धारित तीन दिनों के बाद मैंने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि संगठन के एक कृतज्ञ सदस्य के रूप में उनकी अस्थियों को चुना और उनकी इच्छानुसार उन्हें माँ नर्मदा की गोद में प्रवाहित कर दिया। दवेजी उसी पवित्र नदी में विलीन हो गए, जिसकी सेवा में उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया था। उस दिन मैंने एक बार फिर मोदीजी की बारीकियों पर ध्यान और वैचारिक साथियों व उनके योगदानों के प्रति सम्मान को देखा।

जुलाई, 2024 में भाजपा मुख्यालय में आयोजित ‘स्नेह मिलन कार्यक्रमों’ में भी हमें यही भावपूर्ण अभिव्यक्ति देखने को मिली। मोदीजी ने स्वयं ड्राइवरों, चपरासियों, सफाईकर्मियों, रसोई कर्मचारियों- सबसे भेंट की और पार्टी के प्रति उनकी मौन सेवा तथा समर्पण के लिए आभार व्यक्त किया। जैसे वे मोदीजी के परिवार के ही सदस्य हों।

हर वर्ष मोदीजी श्रद्धेय लालकृष्ण आडवाणीजी के जन्मदिन पर व्यक्तिगत रूप से उनसे मिलने जाते हैं। उन्होंने जब भी शपथ ग्रहण की, तो श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयीजी, आडवाणीजी और जोशीजी जैसे नेताओं से आशीर्वाद लेने अवश्य गए। मोदीजी का यह भाव सम्मान और कृतज्ञता का परिचायक है। इस दौर में, जब कई लोग कुछ उपलब्धि हासिल करने के बाद अपनी जड़ों को भूल जाते हैं, वहीं मोदीजी हमें दिखाते हैं कि सच्चा नेतृत्व वही है, जहाँ आप उन लोगों को याद रखें, जिन्होंने आपके आगे बढ़ने की राह बनाई। ▣

-शिवराज सिंह चौहान.

अपनापन : नरेंद्र मोदी संग मेरे अनुभव
शिवराज सिंह चौहान
पृष्ठ : 312
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