संघ की अनसुनी कहानियाँ : ब्रिटिश सरकार के खिलाफ संस्थाओं में संघ सबसे ऊपर रहा


डॉ. हरीश चंद्र बर्णवाल की पुस्तक ‘संघ की अनसुनी कहानियाँ’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 वर्षों के सफ़र और स्वतंत्रता आंदोलन में उसके महत्वपूर्ण योगदान पर एक तथ्यात्मक जवाब है। यह पुस्तक संघ से जुड़े मिथकों को तोड़ती है और बताती है कि कैसे RSS ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध एक बड़ी शक्ति के रूप में काम किया।

संघ की अनसुनी कहानियाँ / डॉ. हरीश चंद्र बर्णवाल
संघ की अनसुनी कहानियाँ / डॉ. हरीश चंद्र बर्णवाल

डॉ. हेडगेवार से जुड़ी घटनाएँ दिखाती हैं कि संघ ने पर्दे के पीछे ही नहीं, बल्कि खुलकर स्वाधीनता की लड़ाई में भाग लिया। इसमें गांधी, बोस और आंबेडकर जैसे महान सेनानियों के साथ संघ के अल्पज्ञात संबंध भी उजागर किए गए हैं। विभाजन, आपातकाल और कोरोना जैसी हर स्थिति में ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ के मंत्र के साथ गुमनाम स्वयंसेवकों के समर्पण की गाथाएँ हैं। यह सिद्ध करती है कि संघ महज़ एक संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा का एक अनवरत आंदोलन है।

डॉ. हरीश चंद्र बर्णवाल की पुस्तक ‘संघ की अनसुनी कहानियाँ’ का अंश :

संघ की अनसुनी कहानियाँ / डॉ. हरीश चंद्र बर्णवाल
संघ की अनसुनी कहानियाँ / डॉ. हरीश चंद्र बर्णवाल

स्वतंत्रता संग्राम में संघ की गुप्त रणनीति और स्वयंसेवकों का योगदान

स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका कितनी महत्त्वपूर्ण है, इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि ब्रिटिश सरकार ने वर्ष 1940 में स्वयंसेवी संस्थाओं की जो सूची बनाई थी, उसमें संघ को सबसे मजबूत स्वयंसेवी संस्था के रूप में दिखाया गया था। दरअसल संघ ने उस समय जो रणनीति अपनाई, उसकी वजह से अंग्रेज अफसरों को संघ की गतिविधियों पर नजर रखने में काफी कठिनाई हो रही थी। स्वयंसेवक उस समय सक्रिय अनुशीलन समिति, हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना, बब्बर खालसा, गदर पार्टी, कांग्रेस पार्टी व अभिनव भारत जैसे 20 से अधिक संगठनों में सीधे सक्रिय होकर स्वाधीनता के लक्ष्य को परिणति तक पहुँचा रहे थे।

जरुर पढ़िए : कांग्रेस की बदहाली और भाजपा की बढ़ती ताकत का विश्लेषण

वर्ष1938-39 आते-आते संघ की गतिविधियों में तेजी आ गई थी। इससे ब्रिटिश हुकूमत दहशत में आ गई और संघ को कमजोर करने के लिए अगस्त 1940 में स्वयंसेवी संस्थाओं के शारीरिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सरकारी महकमे में संघ की उपस्थिति पर ब्रिटिश खुफिया विभाग ने टिप्पणी की थी, ‘संघ के स्वयंसेवकों को चिह्न‍ित करना कठिन कार्य है, क्योंकि प्रत्येक को छद्म नाम दिया जाता है। खुफिया रिपोर्टमें उदाहरण देते हुए बताया गया कि पंजाब के दिलबाग राय सेठ, जो सरकारी कर्मचारी हैं और ओम प्रकाश वैद्य जो सेना में हैं, वे क्रमश: प्रसन्नचित्त और विष्णुसहाय के नाम से संघ में जाने जाते हैं।’ ब्रिटिश राज के लिए परेशानी का सबब यह था कि चाहेकांग्रेस पार्टी हो, आजाद हिंद फौज हो या फिर स्थानीय स्तर पर हो रहेआंदोलन हों, वे संघ के स्वयंसेवकों को हर जगह पाते थे।

ब्रिटिश गुप्तचर विभाग की रिपोर्ट और संघ की स्वतंत्रता संग्राम योजना

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एक बड़ी योजना तैयार की थी। इस बात से डरकर अंग्रेजी हुकूमत ने संघ पर निगरानी रखने के लिए अपने खुफिया विभाग को लगा दिया था। इस संबंध में ब्रिटिश शासन के गुप्तचर विभाग ने वर्ष 1943 में जो रिपोर्ट प्रस्तुत की, वह राष्ट्रीय अभिलेखागार की फाइलों में सुरक्षित है। इसमें कहा गया है कि संघ योजनाबद्ध तरीके से स्वतंत्रता प्राप्ति की ओर बढ़ रहा है। रिपोर्ट में गुप्तचर विभाग ने संघ के अधिकारियों के प्रवास, कार्यक्रमों एवं शस्त्र प्रशिक्षण पर चिंता प्रकट की थी। गुप्तचर विभाग की रिपोर्ट में संघ के क्रांतिकारियों से संबंधों का भी उल्लेख किया गया था। मई-जून 1943 तक संघ का कार्य तेजी से फैल रहा था। संघ ने 11 शहरों में अधिकारी शिक्षण शिविर लगाए। इन शिविरों में युद्ध कौशल और लड़ाई के तरीकों पर चर्चाकी गई और बताया गया कि संगठन के शक्तिशाली होने पर भारत की स्वाधीनता के लिए अंग्रेजों से संघर्षको तेज किया जाएगा। ब्रिटिश सत्ता को इसकी भनक न लगे, इसलिए इन शिविरों तथा कार्यक्रमों में पूर्ण गोपनीयता बरती जाती थी।

संघ की अनसुनी कहानियाँ / डॉ. हरीश चंद्र बर्णवाल
संघ की अनसुनी कहानियाँ / डॉ. हरीश चंद्र बर्णवाल

संघ के असर से डरकर अंग्रेजों ने ‘गणवेश’ पर लगाई पाबंदी

अंग्रेजी हुकूमत संघ की बढ़ती ताकत से इतना घबरा गई थी कि उसने संघ की यूनिफॉर्म‘गणवेश’ पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी। देश भर में संघ के प्रभाव से वो किस कदर खौफ में थी, इसका अंदाजा उसके गुप्तचर विभाग की रिपोर्टसे ही लगाया जा सकता है। इस रिपोर्ट के आधार पर ही ब्रिटिश शासन ने 5 अगस्त, 1940 को एक अध्यादेश जारी किया। इसमें भारत सुरक्षा कानून 56 व 58 के अंतर्गत किसी भी गैर-सरकारी संगठन द्वारा सैनिक वरदी पहनने और परेड (पथ संचलन) करने पर कानूनी प्रतिबंध लगा दिया गया। ये आदेश सीधे-सीधे संघ को कुचलने का प्रयास था। ब्रिटिश शासन के गुप्तचर विभाग की रिपोर्टों में साफ तौर पर ये लिखा था, ‘संघ का वास्तविक उद्देश्य तो अंग्रेजों को भारत से खदेड़कर देश को स्वतंत्र करवाना है।’ गुप्तचर विभाग ने संघ अधिकारियों के भाषणों को भी इकट्ठा करना शुरू कर दिया था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया, ‘संघ का बड़ी तेजी से विस्तार हो रहा है। उसकी शाखाएँ अब देसी रियासतों सहित पूरेभारत में लग रही हैं। सरकारी सेवाओं में भी संघ की घुसपैठ हो चुकी है और यहाँ तक कि सेना भी इससे अछूती नहीं है।’

सविनय अवज्ञा आंदोलन में संघ ने निभाई सक्रिय भूमिका

महात्मा गांधी ने वर्ष 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत नमक सत्याग्रह और दांडी मार्च के साथ की थी। उन्होंने नमक पर टैक्स लगाने के अंग्रेजों के फैसले के खिलाफ अहमदाबाद में साबरमती आश्रम से नमक सत्याग्रह की शुरुआत की थी। स्वतंत्रता का आंदोलन हो और स्वयंसेवक भाग न लें, ऐसा कैसे हो सकता है! युवा स्वयंसेवकों की टोलियाँ निश्चित स्थानों पर पहुँचकर सत्याग्रह करने लगीं। स्वयंसेवकों का मनोबल देखकर संघचालकों की बैठक में यह निश्चित किया गया कि सत्याग्रह में संघ समर्पित भाव से भाग लेगा। कुछ स्वयंसेवकों ने गणवेश पहनकर भगवा ध्वज के साथ सत्याग्रह में जाने की इच्छा प्रकट की। हालाँकि डॉ. हेडगेवार ने उनकी निष्ठा का सम्मान करते हुए समझाया, “आंदोलन में पूरी तरह समरस होने का प्रयास करना चाहिए। सभी स्वयंसेवक व्यक्तिगत तौर पर आंदोलन में संघचालक की अनुमति से भाग लें।” डॉ. हेडगेवार ने स्वयंसेवकों से कहा, “इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि वर्तमान आंदोलन स्वतंत्रता प्राप्ति की अंतिम लड़ाई होगी। हमें सर्वस्व त्याग कर उसमें कूदने के लिए तैयार रहना चाहिए।” उन्होंने स्वयंसेवकों को अति उत्साह से बचने और अपने पाँव धरती पर टिकाए रखते हुए स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने का निर्देश दिया। यहाँ तक कि संघ ने सत्याग्रहियों की सुरक्षा के लिए 100 स्वयंसेवकों की टोली भी बनाई थी।

संघ की अनसुनी कहानियाँ
डॉ. हरीश चंद्र बर्णवाल
पृष्ठ : 400
प्रभात प्रकाशन
किताब का लिंक : https://amzn.to/4peMuYM