
इतिहास अक्सर विजेताओं द्वारा लिखा जाता है, और इसी प्रक्रिया में कई बार वो सच दब जाते हैं जो सत्ता की चकाचौंध को धुंधला कर सकते हैं। मनोज राजन त्रिपाठी की नई किताब ‘कसाईबाड़ा’ उसी दबे हुए, कुचले हुए और खून से सने हुए इतिहास की एक ऐसी परत खोलती है, जिसे पढ़ते हुए रोंगटे खड़े होना लाजिमी है। यह महज एक किताब नहीं, बल्कि उन 80 हजार मासूमों का तर्पण है जिनकी चीखें 166 साल तक वक्त की धूल में दबी रहीं।
एक रहस्यमयी शुरुआत
कहानी की शुरुआत किसी फिल्मी थ्रिलर जैसी लगती है, लेकिन यह हकीकत की जमीन पर खड़ी है। 7 अक्टूबर 2023 को जब दुनिया हमास और इजरायल के युद्ध की खबरों से कांप रही थी, ठीक उसी वक्त इजरायल के हर्जलिया में रद्दी के एक ढेर से कुछ पुराने दस्तावेज मिलते हैं। ये दस्तावेज भारत के 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के उन 68 दिनों का कच्चा चिट्ठा थे, जिन्हें ब्रिटिश हुकूमत ने शायद दुनिया की नजरों से छिपाए रखने की कोशिश की थी। लेखक ने इन दस्तावेजों के जरिए दिल्ली से कानपुर तक फैले मौत के उस गलियारे का सजीव चित्रण किया है, जिसे इतिहास की किताबों ने हाशिए पर धकेल दिया था।
जनरल डायर से भी खूंखार कर्नल जेम्स स्मिथ नील
इस किताब का सबसे वीभत्स और डरावना चेहरा है- कर्नल जेम्स स्मिथ नील। हम सभी ने जलियांवाला बाग के जनरल डायर की क्रूरता के बारे में पढ़ा है, लेकिन ‘कसाईबाड़ा’ हमें एक ऐसे शैतान से मिलवाती है जिसकी दरिंदगी के आगे हिटलर, ईदी अमीन और पोलपोट भी फीके नजर आते हैं।
लेखक ने शोध के साथ यह स्थापित किया है कि कैसे कर्नल नील ने कानपुर को सचमुच के ‘कसाईबाड़े’ में तब्दील कर दिया था। एक ही स्थान पर मात्र पौने चार घंटे में 900 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार देना किसी सामान्य सैन्य कार्रवाई का हिस्सा नहीं, बल्कि मानसिक विक्षिप्तता की पराकाष्ठा थी। नील ने न केवल हत्याएं कीं, बल्कि धार्मिक भावनाओं को कुचलने के लिए हिंदुओं को गाय और मुसलमानों को सूअर का मांस खिलाने जैसी घिनौनी हरकतें भी कीं।
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यह युद्ध नहीं, भावनाओं का कोलाज है
‘कसाईबाड़ा’ की सबसे बड़ी खूबी इसकी भाषा शैली है। मनोज राजन त्रिपाठी ने इसे केवल शुष्क ऐतिहासिक तथ्यों का संकलन नहीं बनने दिया। इसमें जहाँ एक तरफ बारूद का धुआं और तलवारों की खनक है, वहीं दूसरी तरफ मानवीय संवेदनाओं के तार भी जुड़े हैं।
- इश्क और इंकलाब : किताब में कोठे पर थिरकते उमराव जान के घुंघरुओं की आवाज है, जो उस दौर की संस्कृति और साजिशों के मिलन को दर्शाती है।
- अमीर खुसरो की रूह : सूफियाना गजलों का गुलजार और महल के दीवान-ए-खास की रंजिशें इसे एक मुकम्मल दास्तान बनाती हैं।
- साजिशों का जाल : किताब परत-दर-परत उन गद्दारियों और साजिशों को उजागर करती है, जिनकी वजह से आजादी का वो पहला बड़ा ख्वाब अधूरा रह गया।
शोध और लेखन का सामंजस्य
एक पत्रकार होने के नाते मनोज राजन त्रिपाठी ने अपनी खोजी दृष्टि का बखूबी इस्तेमाल किया है। इजरायल से शुरू होकर बनारस, इलाहाबाद (प्रयागराज) और लखनऊ होते हुए कानपुर तक पहुँचने वाला यह सफर पाठक को खुद उस कालखंड का हिस्सा बना देता है। लेखक ने उन गुमनाम शहीदों को नाम देने की कोशिश की है जिन्हें इतिहास ने सिर्फ ‘विद्रोही’ कहकर छोड़ दिया था।
आज के दौर में जब हम अपनी जड़ों और इतिहास को फिर से तलाश रहे हैं, ‘कसाईबाड़ा’ पढ़ना जरूरी हो जाता है। यह किताब हमें बताती है कि आजादी की कीमत सिर्फ अहिंसक आंदोलनों ने ही नहीं, बल्कि उस बेहिसाब खून ने भी चुकाई है जिसे ‘कसाईबाड़ा’ जैसी जगहों पर बेरहमी से बहाया गया था।
वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'कसाईबाड़ा' हिंदी साहित्य और ऐतिहासिक विमर्श में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। यह किताब पाठकों को झकझोरती है, रुलाती है और अंततः एक गहरे आक्रोश के साथ सोचने पर मजबूर कर देती है। मनोज राजन त्रिपाठी ने रद्दी के ढेर से एक ऐसा जीवंत इतिहास बाहर निकाला है, जो आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाता रहेगा कि हमारी आजादी की नींव में कितनी गहरी और कितनी खौफनाक दास्तानें दफन हैं।
कसाईबाड़ा
मनोज राजन त्रिपाठी
पृष्ठ : 311
वाणी प्रकाशन
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