
मालिनी अवस्थी की कृति ‘चन्दन किवाड़’ से एक अंश पढ़िए…
मुझे आज भी याद है, वे जाड़े के दिन थे। अँगीठी की आँच तापते हुए मैं अपनी वृद्धा ननिया सास से अचानक पूछ बैठी, ‘नानी, नाना कैसे थे? कैसे दिखते थे?’
नानी के चेहरे में लाचारी की मुस्कुराहट फैल गयी। उन्होंने उत्तर देने में एक क्षण का भी समय नहीं लगाया। उनके मुख से निकला, ‘बहू, कबहुँ नजर भर देखा ही नहीं। का बतावें कैसे थे?’ कभी देखा ही नहीं! नानी का जवाब सुन मैं चकित रह गयी। मैंने झट दाँत से अपनी धृष्ट ज़बान काट ली, क्या आवश्यकता थी यह पूछने की! नानी का मन दुःखा होगा। नानी का उत्तर मन को ले गया डेढ़ सौ साल पुराने समाज में…
बाँदा के बड़े सम्मानित परिवार की बहू थी हमारी ननिया सास। तीन पीढ़ियों से सुसज्जित भरा-पूरा परिवार।
नानी का नाम किशोरी था, प्रारब्ध ने किशोरावस्था में सुख छीन लिया, अल्पायु में पति का साथ छूट गया था।
ननिया सास ने जीवन काल का उत्तरार्द्ध हमारे साथ बिताया, विवाह के बाद अपनी माँ के बाद एक नानी थीं जिनसे दिल खोलकर मेरा संवाद होता, उनके जीवन की कहानी, उनकी आपबीती मेरे सामने एक ऐसे युग को ला खड़ा कर देती थी कि कितने ही लोकगीतों की होने की वजह समझ में आने लगती थी।
अँगीठी में चिमटे से कोयले की राख को नीचे झाड़ते हुए मैंने कहा, ‘चलो नानी, कुछ और बात करते हैं।’ लेकिन नानी अभी वहीं थीं, स्मृतियों में डूबी हुई, मुस्कुराकर बोलीं, ‘सच मानो बहू, कछु यादे नहीं। पुरानी बात हुई गई, ओई जमाने दूसर रहे। बेटा बहुरिया एक साथ नाही रहत रहें। अरे बिटिया घर माँ दूनो को एक साथ कोई देख ले, तो खानदान भर मजाक उड़त रहे। सास-ननद जीना हराम कर दें। उ टैम अलग रहा। परिवार बड़ा रहा, ऐसे आज जैसे देखा-देखी, मिला-मिली नाही होवत रहे। घूँघट कै भीतर से देखें कि हिम्मत भी ना रही।
त ए बहु, का बताई मुन्नी के बाबू देखे में कइसे लागत रहें, साँचों, हम कबहुँ उनका नजर भर देखा नहीं। एक बेर छत पर टहिरत रहें, हम ना चीन्हि पाई, ननद ने आँखे दिखाई, भीतर चलो, हम डिराय कै भीतर भाग आईं, फिर कबहुँ अटरिया की ओर चितबै नाही कीन्ह।’
न जाने क्यों, मैंने वृद्धा नानी को गले से लगा लिया। नानी की वेदना उन तमाम स्त्रियों की वेदना थी जिसकी कल्पना कर मैं मन ही मन विचलित हो उठी थी। मैं उस युग की सामाजिक वर्जनाओं के विषय में सोच रही थी, उस काल खण्ड में ही रचे गये होंगे ऐसे अनगिनत गीत जो पिया से मिलने की कामना का जप करते हुए मन्त्र से प्रस्फुटित हुए होंगे। मन में उस किशोरी की छवि तैरती रहती जो अटरिया की ओर निहार भी न सकी।

कुछ वर्ष बीत गये…
चाँदनी रात थी, छत पर महफ़िल लगी हुई थी, मुझसे गाने का इसरार हुआ। मैंने सोचा क्या गाया जाये और एक पुराने दादरे का स्मरण हो आया। विचारते हुए मेरी नज़र आसमान में विराजे सुन्दर चन्द्रमा पर गयी, मनुष्य और प्रकृति में कैसा अन्तरंग सम्बन्ध है। अपने मन की गहरी बात जो वह किसी हमसे नहीं कह पाता, प्रकृति उसे कितनी उदारता मनोयोग से सुन लेती है।
चाँदनी छिप जइहो अटरिया।
दिन की बैरन सास ननदिया
रात की जुन्हैया अटरिया
पैर दबाय मैंने सास सुलाय दिन्हो
ननदी है मनबढ़िया अटरिया
कंगना पहिनाय मैंने ननदी विदा की
जेठा बड़े हैं गवैया अटरिया
खाँस खँखार मैंने जेठा विदा की
देवरा बड़े हैं पढ़ैया अटरिया
घड़िया पहनाय मैंने देवरा विदा की
रोवन लागै ललनवा अटरिया
दूध पियाय मैंने ललना सुलाय दीन्हौ
बोलन लागीं चिरैया अटरिया
चाँदनी में भीगते हुए यह गीत सुनते हुए सबके चेहरों की लालिमा आज भी भूलती नहीं। वह क्या है न, कभी-कभी गायन में वह अनुभूति हो जाती है, जो समय परिवेश से परे जाकर मन को भर देता है। गीत का अर्थ यूँ है :
एक भरे-पूरे परिवार में नायिका को चाँदनी से शिकायत है। वह कहती है, ए चाँदनी, तुम कहीं जाकर छिप जाओ, तुम्हारी किरणों ने इस रात को इतना रौशन कर दिया है, दिन में तो सास-ननद का पहरा है और रात में तुम्हारी रौशनी का।
जो यहाँ नहीं कहा गया वही मूल चिन्ता है। जुन्हाई यानी चाँदनी रात पिया से मिलन में व्यवधान उपस्थित कर रही है। मिलन का गोपनीय होना अनिवार्यता है, चन्द्रमा के रहते यह कैसे होगा। अटरिया एकान्त का सूचक है।
सास की सेवा कर मैंने उन्हें सुला दिया है, लेकिन मेरी ननद बहुत मनबढ़ है (वह अटरिया पर जाग रही है)
इसे भी पढ़िए : मीरां का राजपूतीकरण व पुनर्वास
ननद को कंगना पहना मैंने वहाँ से भेजा, लेकिन मेरे जेठ बड़े गवैया हैं इसी समय अटरिया पर गा रहे हैं। खाँस-खँखार कर मैंने जेठ को वहाँ से विदा किया, छोटा देवर वहीं छत पर पढ़ रहा है, उसे घड़ी का प्रलोभन देकर पहनाकर विदा किया, तब तक मेरा लाल रोने लगा, दूध पिलाकर उसे सुलाकर जैसे ही मैं पिया से मिलन को अटरिया आयी, चिड़िया बोलने लगी, संकेत है कि पिया से मिलन की जद्दोजहद में सुबह हो गयी। इस गीत में संयुक्त परिवार की सुमंगल उपस्थिति का माधुर्य भी है और दुश्वारियाँ भी। प्रियतम को एकान्त में न मिल पाने की लाचारी परिस्थितिजन्य यथार्थ है। नायिका की उमंग पर कुठाराघात है। लेकिन सत्य का उद्भेदन यही है कि प्रतीक्षा में जो आनन्द है वह पाने में नहीं। इसीलिए राधा-कृष्ण को न पाकर भी पूर्ण हैं। सीता-राम से वियुक्त होकर भी संयुक्त हैं।
~मालिनी अवस्थी.
चन्दन किवाड़
मालिनी अवस्थी
पृष्ठ : 240
वाणी प्रकाशन
किताब का लिंक : https://amzn.to/4p7OOAQ