
अमेरिका और यूरोप में ऑडियोबुक्स का इतिहास बदलती जीवनशैली से गहराई से जुड़ा है। इसकी शुरुआत 1930 के दशक में दृष्टिबाधित लोगों के लिए बनाए गए एक प्रोजेक्ट से हुई थी, जिसे ‘टॉकिंग बुक’ कहा जाता था। धीरे-धीरे साहित्य रिकॉर्ड्स से कैसेट और फिर सीडी तक पहुँचा। 1980 और 90 के दशक तक, काम करते हुए या सफर के दौरान ऑडियोबुक्स सुनना काफी लोकप्रिय हो गया। आज इन क्षेत्रों में ऑडियोबुक मार्केट पब्लिशिंग इंडस्ट्री का सबसे तेजी से बढ़ने वाला हिस्सा है।

भारत में ऑडियोबुक्स का बढ़ता प्रभाव
भारत में ऑडियोबुक्स का उदय और विकास काफी दिलचस्प रहा है। शुरुआत में इसकी मौजूदगी कम थी, लेकिन पिछले पाँच वर्षों में इसने जबरदस्त रफ़्तार पकड़ी है। साल 2018 और फिर कोविड-19 महामारी के दौर ने लोगों के कहानियाँ सुनने और ज्ञान हासिल करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया।
प्रमुख ऑडियोबुक प्लेटफॉर्म्स –
इन ऐप्स के अलावा, YouTube भी एक बड़ा मुफ्त जरिया है जहाँ लोग ढेरों ऑडियोबुक्स और कहानियों का आनंद ले रहे हैं।

लोकप्रियता बढ़ने के मुख्य कारण
1. स्मार्टफोन और सस्ता इंटरनेट : इसने ऑडियोबुक्स को हर किसी की पहुँच में ला दिया है। कसरत करते, टहलते या घर के काम निपटाते हुए इन्हें सुनकर समय की बचत की जा सकती है।
2. समावेशी पहुंच : ऑडियोबुक्स हर किसी के लिए मजेदार हैं। विशेष रूप से दृष्टिबाधित लोगों और पढ़ने में कठिनाई महसूस करने वालों के लिए यह साहित्य तक पहुँचने का एक आसान और बाधा-मुक्त तरीका है।
3. हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं का दबदबा : अब ऑडियोबुक्स केवल अंग्रेजी तक सीमित नहीं हैं। प्रेमचंद, टैगोर, महादेवी वर्मा और जयशंकर प्रसाद जैसे महान लेखकों की रचनाएँ अब एक क्लिक पर उपलब्ध हैं। मन्नू भंडारी जैसे दिग्गजों का साहित्य ऑडियो फॉर्मैट में आने से क्लासिक रचनाएँ पहले से कहीं अधिक सुलभ हो गई हैं।
4. युवा पाठकों के लिए आकर्षण : यह देखना सुखद है कि ऑडियोबुक्स बच्चों और युवाओं में पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा दे रही हैं –
- बच्चे : रामायण, गीता, पंचतंत्र और प्रेमचंद की कहानियाँ बहुत लोकप्रिय हैं। बच्चों के लिए ऑडियोबुक्स एक ‘आधुनिक किस्सागो’ की तरह हैं, जैसे दादी-नानी कहानियों के जरिए भावनात्मक लगाव बनाती थीं।
- युवा : सेल्फ-हेल्प किताबें, उपन्यास और प्रतियोगी परीक्षाओं की गाइड्स युवाओं को लगातार सीखने के लिए प्रेरित कर रही हैं।
5. प्रकाशकों और लेखकों के लिए अवसर : ऑडियोबुक्स के दौर ने क्रिएटर्स के लिए नए दरवाजे खोले हैं –
- इससे छपाई का भारी खर्च खत्म हो जाता है।
- लेखकों और प्रकाशकों के लिए कमाई और रॉयल्टी का एक नया जरिया बना है।
- नए लेखकों को अपना काम दिखाने का मंच मिला है, जिससे अच्छी क्वालिटी के कंटेंट को आसानी से पहचान मिल रही है।
ऑडियोबुक्स को वैश्विक पहचान
दुनिया भर में ऑडियोबुक्स को सीखने और कहानी सुनाने के एक शक्तिशाली माध्यम के रूप में पहचान मिल रही है। उदाहरण के लिए, दलाई लामा की ऑडियोबुक ‘Meditations : The Reflections of His Holiness the Dalai Lama’ ने ‘बेस्ट ऑडियोबुक, नरेशन और स्टोरीटेलिंग रिकॉर्डिंग’ का ग्रैमी अवार्ड जीता। ऐसी सफलताएँ दिखाती हैं कि ऑडियोबुक्स केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि व्यक्तिगत विकास और ज्ञान फैलाने का बड़ा जरिया हैं।

ऑडियोबुक्स के सामने चुनौतियाँ
तेजी से बढ़ते इस क्षेत्र के सामने भारत में कुछ बड़ी चुनौतियाँ भी हैं –
- भाषाई विविधता : भारत में हिंदी, तमिल, बंगाली, मराठी और तेलुगु जैसी भाषाओं की भारी मांग है। लेकिन सही उच्चारण और क्षेत्रीय लहजे के साथ प्रोफेशनल रिकॉर्डिंग करना मुश्किल और खर्चीला काम है।
- कीमत और भुगतान क्षमता : भारतीय बाजार में लोग अक्सर डिजिटल कंटेंट को मुफ्त या बहुत कम कीमत पर चाहते हैं। इसके साथ ही पायरेसी की समस्या लेखकों और प्रकाशकों की कमाई को प्रभावित करती है।
- डिजिटल अंतर : कई ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में आज भी इंटरनेट की कमी है, जिससे आबादी का एक बड़ा हिस्सा ऑडियोबुक्स से महरूम रह जाता है।
- हुनरमंद लोगों की कमी : क्षेत्रीय भाषाओं में कहानी सुनाने वाले अच्छे ‘वॉइस आर्टिस्ट्स’ की कमी है। सही टोन और उच्चारण वाले कलाकार ढूँढना प्रकाशकों के लिए एक बड़ी चुनौती है।
इन चुनौतियों के बावजूद, ऑडियोबुक्स का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी बेहतर होगी और इंटरनेट का विस्तार होगा, ये बाधाएँ दूर हो जाएँगी। ऑडियोबुक्स में भारत और दुनिया को अधिक शिक्षित और ज्ञान-संपन्न बनाने की पूरी क्षमता है।
इसे भी पढ़ें : जीवन को सही दिशा देनेवाली 5 किताबें