इरा टाक का नया उपन्यास ‘प्यार के इस खेल में’ रोमांस और रोमांच का एक दिलचस्प संगम है। इसे प्रभात प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।
प्रोफ़ेशनल जीवन में शिखर पर बैठी डॉ. त्रिशा, प्यार में मिले पहले धोखे से उबर नहीं पाई है। वह एक दोराहे पर खड़ी है, जहाँ एक ओर आईपीएस विक्रांत का वर्षों पुराना, निःस्वार्थ एकतरफा प्यार है। विक्रांत, ना सुनने के बावजूद, हर मुसीबत में उसका ढाल बनकर खड़ा रहता है। दूसरी ओर, राहुल का गहरा जुनून है, जो त्रिशा को अपनी ओर खींचता है, पर यह नया आकर्षण एक बड़े तूफ़ान का संकेत है।

क्या त्रिशा विक्रांत की दोस्ती को चुनेगी या राहुल के जुनून को? क्या उसे वो सच्चा साथी मिलेगा जो उसे समझे? यह कहानी प्यार में भरोसे की तलाश है।
पढ़िए उपन्यास ‘प्यार के इस खेल में’ का एक अंश :
बर्फ़ से ढकी हुई वादियों में एक हसीन जोड़ा घूम रहा था। लड़के के दिल में बहुत कुछ था, जो वो लड़की को बताना चाहता था, पर न जाने क्यों उसके होंठ ख़ामोश थे और लड़की उसके दिल के हाल से बेख़बर अपने आप में खोई हुई थी, फिर अचानक लड़के की तरफ़ घूमकर पूछ बैठी—
“तुम इतने चुप क्यों रहते हो?”
लड़का धीमे से मुस्कुराया, मुहब्बत उसकी आँखों में उतर आई थी–
“ताकि तुम मेरी खामोशी सुन सको।”
लड़की पास आई और उसने अपना हाथ लड़के के सीने पर रख दिया और अपनी बड़ी-बड़ी खूबसूरत आँखों को बंद कर लिया। लड़का उसको देखकर मुसकराता रहा। फिर लड़की ने अचानक अपनी आँखें खोल दीं।
“सुन लिया, अब यही बात शब्दों में कह दो।”
लड़के ने लड़की के नरम नाज़ुक हाथों को अपने हाथों में थामते हुए चूम लिया–
“तुम क्या हो मेरे लिए, ये शब्दों में कैसे कहूँ मेरी हर धड़कन तेरी धड़कन के बाद आती है।”
लड़की शरमा गई, कुछ सेकंड्स लड़के की आँखों में देखने के बाद उसने अपने हाथ छुड़ा लिये और खिलखिलाते हुए बर्फ पर भागने लगी–
“चल झूठे!”
बर्फ पर भागती हुई लड़की की खिलखिलाहट से पेड़ मुसकराने लगे थे, जिसकी वजह से उन पर जमी बर्फ झड़ने लगी थी। लड़का धीमे-धीमे अपनी मुहब्बत समेटे लड़की के पीछे आ रहा था कि अचानक लड़की का पैर फिसला और वो एक गहरी खाई में जा गिरी।
“त्रिशा!”
विक्रांत ज़ोर से चीखता हुआ उठ बैठा, उसके हाथ-पैर इतने ठंडे हो रहे थे, मानो बर्फ की तह से निकल कर आया हो। उसको नॉर्मल होने में कुछ वक़्त लगा और एहसास हुआ कि ये हकीकत नहीं, बल्कि एक बुरा सपना था। अँधेरे में हाथ से टटोलते हुए उसने साइड में लगा टेबल लैंप ऑन कर दिया और पास में रखी बोतल से पानी की कुछ घूँट अपने गले में उतारी। विक्रांत की बड़ी-बड़ी आँखों में अभी तक सपने में दिखा हादसा बादलों की तरह मंडरा रहा था। उसने अपना मोबाइल उठाते हुए टाइम चेक किया, सुबह के चार बज रहे थे, फिर मोबाइल की गैलरी में स्क्रॉल करते हुए त्रिशा की तसवीरें देखने लगा, उसकी धड़कन बढ़ गई थी। वो बरसों से त्रिशा के इंतज़ार में था और शायद ही कोई रात होगी, जब वो उसको याद करते हुए नहीं सोया होगा। उसे लगता था कि त्रिशा को अपने दिल की बात बताने का सही वक़्त आ चुका है। पिछले आठ सालों से त्रिशा उसके दिल में दबी हुई थी और अब इस चाहत को धूप दिखाने का वक़्त आ चुका था।
..
हॉस्पिटल से लौटते ही त्रिशा अपने कमरे में घुस गई। जयपुर के एस.एम.एस. मेडिकल कॉलेज से एम.डी. कर रही डॉ. त्रिशा गौड़, तकरीबन 24 साल की थी, इस वक़्त उसके खूबसूरत मासूम चेहरे पर धोखा, दर्द और गुस्से की मिली-जुली परछाईं थी। उसका लेब्राडोर ब्रीड का पालतू गूगल उसके पीछे-पीछे उछलता हुआ आया, पर त्रिशा ने उसे हमेशा की तरह प्यार नहीं किया। त्रिशा ने अपने बॉयफ्रेंड टोनी को एम.बी.बी.एस. फोर्थ ईयर की रैना अवस्थी के साथ उसके कमरे में पकड़ा था। टोनी के बारे में वो ऐसी बातें कई दिनों से सुनती आ रही थी, पर आज तो उसने अपनी आँखों से देख लिया था। वो गुस्से में बहुत ज़ोर से चीखी थी, जिसको सुनकर हॉस्टल में मौजूद रेज़िडेंट डॉक्टर्स भी अपने रूम्स से बाहर आ गए थे।

“टोनी…हाउ कैन यू डू दिस टू मी? तुमने मुझे चीट करने से पहले एक बार भी नहीं सोचा?”
टोनी ने त्रिशा को शांत करने की कोशिश की, “त्रिशा…सुनो तो यार, ऐसा कुछ नहीं है, रैना सिर्फ़ नोट्स लेने आई थी।”
“मैं कोई छोटी बच्ची नहीं हूँ, जो मुझे कुछ समझ न आए…इट्स ऑल ओवर टोनी!”
त्रिशा का सारा यकीन चकनाचूर हो गया था, वो रोती हुई वहाँ से निकल गई थी।
डॉ. टोनी डिसूज़ा, जो न्यूरोलॉजिस्ट था, उस पर त्रिशा का क्रश तब से था, जब टोनी उनकी एम.बी.बी.एस. में क्लास लेने आया करता था और पिछले डेढ़ साल से दोनों रिलेशनशिप में थे।
त्रिशा ने कमरे में आकर दरवाज़ा लॉक किया, बिना कपड़े बदले ही वो बिस्तर पर गिर गई और फूट-फूटकर रोने लगी। गूगल हैरान-परेशान सा उसका मुँह चाटने की कोशिश कर रहा था। तभी दरवाज़े पर उसकी मम्मी प्रीति ने नॉक किया।
“क्या हुआ छोटी? रो क्यों रही है, दरवाज़ा खोल।”
वो झटके से उठी, अपने आँसू पोंछे और दरवाज़ा खोल दिया। प्रीति मैहरून कलर का बाथरोब पहने, बालों में हिना लगाए खड़ी थी।
“कुछ नहीं मम्मी…थोड़ा हेडेक है।”
उसकी कजरारी भूरी आँखें सूजकर छोटी हो गई थीं और खूबसूरत पैनी नाक लाल हो रही थी।
“क्यों झूठ बोल रही है? बाहर तक आवाज़ आ रही थी तेरे रोने की…हेडेक में कौन रोता है, क्या हुआ, बता तो?”
“कुछ नहीं, हॉस्पिटल में आज किसी पेशेंट से कुछ कहासुनी हो गई थी, इसलिए मूड खराब है।”
उसने किसी तरह बात टालने की कोशिश की। प्रीति टोनी को बिल्कुल पसंद नहीं करती और अगर उनको टोनी की चीटिंग का मालूम हो जाता तो वो उसे सुनाने का मौका नहीं छोड़ती।
“कौन था वो कमीना पेशेंट? डिटेल बता, तेरे पापा को बोलती हूँ, उसकी हिम्मत कैसे हुई तुझे कुछ बोलने की…”
“अरे यार मम्मा, रहने दो, चलता रहता है ये सब तो…मैं फ्रेश होती हूँ तब तक आप शांति आंटी को बोल दो कि वो मेरे लिए चाय बना दें।”
प्रीति आकर उसके पास बैठ गई और प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा, “ठीक है, कुछ खाएगी?”
“आई एम नॉट हंगरी, आई एम गोइंग टू टेक अ शावर।”
प्रीति वहाँ से चली गई। त्रिशा ने बाथरूम में जाते ही शावर चालू कर दिया। गर्म पानी से उसको राहत महसूस हुई। बाथरूम में लगे आदमकद शीशे में खुद को देखने लगी, ख़ूबसूरत संगमरमर-सा तराशा बदन। जब से टोनी मिला था, उसने भी इन्स्पायर होकर जिम जॉइन कर लिया था। टोनी डॉक्टर कम और बॉडी बिल्डर ज़्यादा लगता था। त्रिशा को उसकी मज़बूत बाहें बहुत पसंद थीं, जिनमें खोकर वो बाक़ी सब भूल जाती थी।
“क्या कमी है मुझमें? क्यों टोनी को दूसरी लड़कियों की ज़रूरत होती है, उसने क्यों चीट किया मुझे?”
उसके आँसू शावर के पानी के साथ मिल गए थे। देर तक नहाने के बाद उसने अपना सबसे फेवरट पिस्ता रंग का नाइट सूट पहना, जिस पर एवाकाडो के कार्टून्स बने हुए थे, जब वो दुःखी होती थी, तब इस नाइट सूट में उसको सुकून मिलता था।
त्रिशा के पापा महेश ने पिछले महीने ही जयपुर के पॉश इलाक़े राजा पार्क में एक बड़ी कोठी ख़रीदी थी, कोठी के बाहर काले पत्थर पर सुनहरे रंग से ‘प्रीति विला’ लिखा हुआ था। कोठी में एक छोटा सा स्विमिंग पूल भी था। त्रिशा का कमरा फ़र्स्ट फ़्लोर पर था, जिसमें बड़ी सी बालकनी थी, वो अपनी बालकनी में रखे एक बड़े झूले पर अभी अकेली बैठी हुई एक किताब उलट-पलट कर रही थी। कुछ पन्ने पढ़ने के बाद उसका मन उचट गया तो उसने अंदर जाकर लैपटॉप पर ‘फ़िफ्टी शेड्स फ़्रीड’ फ़िल्म लगा ली। ये बहुत रोमांटिक फ़िल्म थी, इस सीरीज़ की दो फ़िल्में वो पहले देख चुकी थी। उसे फ़िल्म के हीरो, स्टील ग्रे जैसा प्रेमी चाहिए था और टोनी लगभग वैसा ही था—दीवानगी से भरा हुआ और कमिटमेंट से हमेशा बचने वाला—और वो एक्ट्रेस एना की तरह उसके प्यार में पागल थी। इस फ़िल्म की शुरुआत एना और स्टील ग्रे की शादी से होती है। तभी गूगल आया और उसके बिस्तर पर बैठ गया, वो प्यार से गूगल के मुलायम बालों पर हाथ फेरने लगी।

गूगल की बड़ी भूरी मासूम आँखें और चमकीले सुनहरे बाल त्रिशा को बेहद पसंद थे। फ़िल्म में रोमांटिक और इंटीमेट सींस की भरमार थी, जो उसके अंदर बेचैनी जगा रही थी। वो अपने और टोनी के इंटीमेट पलों को याद करते हुए इमोशनल होने लगी थी कि तभी गूगल अचानक बाहर भौंकते हुए भागा। बाहर मची चीख़-पुकार से त्रिशा का ध्यान भंग हुआ, वो नीचे भागी तो देखा, कंधे पर एक बैग टाँगे और हाथ में कुछ फ़ाइल्स लिए एक लड़का अंदर ड्रॉइंग रूम में आ गया था, इससे पहले कि शांति आँटी गूगल को पकड़ती या वो लड़का सावधान बनता, तब तक गूगल उसकी टाँग में दाँत गड़ा चुका था।
त्रिशा दूर से ही चिल्लाई, “नो गूगल, नो…लीव!”
वो लड़का त्रिशा को एकटक देखता रह गया। उसकी बड़ी आँखें और ज़्यादा बड़ी हो गई थीं और मुँह खुला रह गया था। त्रिशा ने गूगल के गले में लीश बाँधते हुए उसे घूरा, “हू आर यू? आप बिना पूछे अंदर कैसे घुस आए?”
सिर पर बहुत छोटे बाल और फ्रेंच कट दाढ़ी लिये वो लम्बा लड़का देखने में ठीक-ठाक सा था। वो कुछ बोलता, इससे पहले ही त्रिशा के पापा महेश बाहर आ गए। उनकी उम्र 60 हो चुकी थी, बालों में हल्की सफ़ेदी थी, पर वो देखने में चुस्त-तंदुरुस्त थे, उन्होंने बड़े प्यार से राहुल की तरफ़ हाथ बढ़ा दिया—
“अरे, आओ राहुल, ज़्यादा तो नहीं काटा?”
“हेलो सर, अरे नहीं, मैं ठीक हूँ।”
महेश त्रिशा की तरफ़ मुख़ातिब होते हुए मुसकराए—
“इनको एक लोन के सिलसिले में मैंने ही बुलाया था, बैंक में मार्केटिंग एक्ज़ीक्यूटिव हैं।”
त्रिशा बिना कोई भाव चेहरे पर लाए गूगल को लेकर अंदर चली गई। पाँच मिनट बाद त्रिशा ड्रॉइंग रूम में मेडिकल बॉक्स लिये आई और राहुल के पास गई, “शो मी द बाइट।”
“अरे, कुछ नहीं, मामूली सी खरोंच है।”
“लेट मी सी।”
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राहुल ने अपनी जींस को मोड़कर ऊपर किया तो टखने के थोड़ा ऊपर ख़ून निकल रहा था। त्रिशा ने उसे डेटॉल से साफ़ किया और उस पर एंटीसेप्टिक क्रीम लगा दी।
“इस घाव को खुला रखना, डॉग बाइट पर पट्टी नहीं बाँधी जाती है, वैसे गूगल ने पहले किसी को नहीं काटा।”
महेश हाथ में लिये पेपर पलटते हुए बोल पड़े—
“ग़लती मेरी है, मैंने ही बोला था, दरवाज़ा खुला है, अंदर आ जाओ, क्या पता था कि गूगल आज अपना रंग दिखाएगा!”
राहुल हँसा, “कोई बात नहीं… इनके मूड की बात है, पहले मेरे पास भी एक लेब्राडोर था।”
त्रिशा ने इंजेक्शन निकाल लिया, जिसको देखकर राहुल चौंक गया।
“अभी टिटनस का इंजेक्शन दे रही हूँ, वैसे तो गूगल वैक्सीनेटेड है, पर अगर आप एंटी रेबीज़ लगवाना चाहें तो किसी भी गवर्नमेंट डिस्पेंसरी में फ्री है या फिर मैं कंपाउंडर को बोल दूँगी, आप एड्रेस लिखा दें, घर आकर ही लगा जाएगा।”
त्रिशा राहुल का जवाब सुनने से पहले ही अंदर चली गई, राहुल को हैरान देख पापा मुस्कुराए—
“डॉक्टर है, एस.एम.एस. मेडिकल कॉलेज से अभी एम.डी. कर रही है, सेकंड ईयर है।”
“ओह ग्रेट!”
“अच्छा बताओ राहुल, क्या लोगे, चाय या कॉफ़ी?”
“कुछ नहीं सर, अभी चाय पीकर ही आया हूँ, मेरा घर दो गली छोड़कर ही है।”
“अरे वाह…कब से हो यहाँ?”
“जी, यहीं से हैं दादा के ज़माने से, तब यहाँ दो-चार ही घर थे, पार्क के ठीक सामने पीला वाला घर ‘मल्होत्रा हाउस’ हमारा ही है।”
“बढ़िया… मैं डेली पार्क में मॉर्निंग वॉक पर आता हूँ।”
“सर, कल घर पर चाय पीकर जाइएगा… ये पेपर्स तैयार कर लिये हैं मैंने।”
राहुल ने फाइल महेश गौड़ की तरफ़ बढ़ा दी। वो पेपर्स चेक करने लगे और राहुल की नज़र दरवाज़े पर थी, पर त्रिशा उसे दोबारा नज़र नहीं आई। घर की केयर टेकर शांति पानी, चाय और नाश्ता टेबल पर रख गई थी।
प्यार के इस खेल में
इरा टाक
पृष्ठ : 216
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