मीरां का राजपूतीकरण व पुनर्वास : 19-20वीं सदी के अकादमिक विमर्श में मीरां


नैन्सी मार्टिन के अध्ययन में बताया गया है कि 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में इतिहासकारों ने मीरां की छवि को किस प्रकार गढ़ा। ये इतिहासकार राजस्थानी पृष्ठभूमि से थे, जिन्होंने मीरां का ‘राजपूतीकरण’ और ‘पुनर्वास’ शुरू किया, जो आज भी जारी है। श्यामलदास ने ‘वीरविनोद’ में मीरां को भोजराज की पत्नी बताकर और उनकी प्रताड़ना को देवर के शासनकाल से जोड़कर, उन्हें ‘विराग के गीत गाने वाली’ और एक आदर्श पत्नी के रूप में चित्रित किया। मुंशी देवी प्रसाद ने भी उनकी प्रताड़ना को विधवा होने के बाद दिखाया, जिससे मीरां का विद्रोही रूप पारिवारिक संस्था के भीतर समायोजित हो गया। इस तरह मीरां एक आदर्श हिन्दू पत्नी और राष्ट्रवादी सत्यवादी नारी के रूप में प्रस्तुत हुईं।

मीरां का राजपूतीकरण व पुनर्वास : 19-20वीं सदी के अकादमिक विमर्श Bhakti Ke Stree-Svar
मीरां का राजपूतीकरण व पुनर्वास

नैन्सी मार्टिन ने उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से उभर रहे अकादमिक हलकों में मीरां की राजनीति के माध्यम से बनी मीरां की छवि का प्रभावी अध्ययन किया है। मार्टिन का काम दर्शाता है कि उन्नीसवीं सदी के अन्त में मीरां का अध्ययन करने वाले इतिहासकार स्वयं राजस्थानी पृष्ठभूमि और राजपूत दरबारी सन्दर्भ से आते हैं और उन इतिहासकारों ने मीरां की जो छवि गढ़ी वही बाद में सर्वमान्य होती चली गई। क्योंकि इस समय मीरां का ‘राजपूतीकरण’ और ‘पुनर्वास’ शुरू होता है जो काफी हद तक आज भी चल रहा है।

राजपूतीकरण का तात्पर्य उन्नीसवीं सदी के ऐतिहासिक आख्यानों में उभरा वह विमर्श है जिसमें राजपूत रजवाड़े इतिहास में अपने शौर्य और वीरता के आख्यान को ‘रिकवर’ करते हैं और उनकी अस्मिता को एक वृहत्तर भारतीय राष्ट्र की अस्मिता के साथ एकमेक करते हैं। इस विमर्श का उद्भव जेम्स टॉड के ‘एन्लस एंड ऐंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान’ (1829-1832 ई.) से होता है। जेम्स टॉड अपने ‘राजस्थान’ में चारण-भाटों के कहे आख्यानों को बहुत कुछ ‘फेस वैल्यू’ पर लेता है और राजपूतों के शौर्य की वह महान गाथा लिखता है जो राजस्थान को भारतीय स्तर पर ही नहीं वैश्विक स्तर पर बड़ा स्थान दिलाती है। टॉड का ‘इतिहास’ राजस्थान पर आधुनिक अकादमिक व ऐतिहासिक लेखन की शुरुआत माना जा सकता है। इसका प्रभाव उन्नीसवीं सदी के राष्ट्रवादी लेखन जैसे बंकिमचन्द्र पर तो पड़ता ही है, मेवाड़ के श्यामलदास जैसे दरबारी सन्दर्भ में लिख रहे इतिहासकारों पर भी पड़ता है।

दरअसल श्यामलदास ही अपने ‘वीरविनोद’ में मीरां के जीवन का वह लोकप्रिय चित्र खींचते हैं जिसे इस आलेख की शुरुआत में दिया गया है। वे कर्नल टॉड की अवधारणा कि मीरां राणा कुम्भा की रानी थी को खारिज करते हैं और जोधपुर की तवारीखों का हवाला देते हुए मीरां को भोजराज की पत्नी दिखाते हैं। जोधपुर की तवारीखों से जाहिर है श्यामलदास का मंतव्य ‘नैणसी री ख्यात’ में आये मीराँ के उल्लेख से है जिस पर पर्याप्त विवाद रहा है। ‘वीरविनोद’ में श्यामलदास मीरां को ‘विराग के गीत गाने वाली’ रानी कहते हैं और उनके दुख का उल्लेख करते हैं जो उन्होंने उनके देवर के सत्तारूढ़ होने पर भोगा था। यानी श्यामलदास मीरां के दुख को ससुर या पति के काल में नहीं बल्कि देवर के काल में दिखाकर विवाह संस्था के आदर्श को बचाते हैं। इस तरह वे एक आदर्शित पत्नी के रूपक की आधारशिला रखते हैं जो बाद में बहुत विकसित होता है, यानी श्यामलदास ‘राजपूतीकरण’ में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

मीरां का राजपूतीकरण व पुनर्वास : 19-20वीं सदी के अकादमिक विमर्श Bhakti Ke Stree-Svar
भक्ति के स्त्री-स्वर / नवनीत आचार्य

मीरां के चरित्र का ‘राजपूतीकरण’ वह प्रक्रिया है जिसमें मीरां को भारतीय राजपूत की एक आदर्श नारी के रूप में चित्रित किया जाता है जो अपने प्रेम और सत्य के लिए स्वयं का बलिदान देने के लिए तैयार हो जाती है। राष्ट्रवादी आन्दोलन के इस दौर में मीरां एक बहादुर और सशक्त नारी के रूप में प्रस्तुत की जाती है जो एक आदर्श भारतीय नारी का आख्यान रचती है। जाहिर है मीरां बाई का चरित्र इतिहास में इस तरह से एकरूपीय नहीं था क्योंकि वे अनेक राजपूती मर्यादाओं और अपेक्षाओं के विरोध में खड़ी थीं। इसलिए राष्ट्रवादी सन्दर्भ में लिख रहे राजस्थान के इतिहासकार मीरां का राजपूत शौर्यगाथाओं में अनुसरण यानी ‘रिहेबिलीटेशन’ करते हैं।

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मीरां का मेवाड़ में विवाह, उनका भोजराज की विधवा होना, उनके देवर रत्नसिंह और विक्रमादित्य के समय उनका मेवाड़ में बुरा समय गुज़रना आदि श्यामलदास के ‘वीरविनोद’ में प्रमुखता पाता है। श्यामलदास जेम्स टॉड की गलतियों को गिनाते हैं लेकिन उनसे खासे प्रभावित भी लगते हैं। मीरां के राजपूत ‘पुनर्वास’ की प्रक्रिया में मुंशी देवी प्रसाद का लिखा ‘मीरांबाई का जीवन चरित्र’ (1898 ई.) एक बड़ा प्रस्थान बिन्दु है क्योंकि इसमें विस्तार से यह दिखाया है कि मीरां का वैवाहिक जीवन सुखी था और उनकी असली प्रताड़ना उनके विधवा होने के बाद शुरू होती है। देवीप्रसाद के अनुसार मीरां ने रत्नसिंह और विक्रमादित्य के समय में बहुत दुःख भोगा। अपने देवर और शासक के सामने सत्य और प्रेम के लिए मीरां का अडिग बने रहना मीरां की विद्रोही छवि तो बनाता है लेकिन पति के बजाय देवर को उन्हें प्रताड़ित करने वाला दिखाकर यह चित्रण विवाह-संस्था को बचा ले जाता है। इस छवि के अनुसार मीरां अपने वैवाहिक जीवन में सुखी और भक्ति-भाव वाली स्त्री थीं और सन्तों के साथ उनका घूमना उनके विधवा होने के बाद शुरू होता है। इस तरह मीरां का विद्रोही स्वरूप पारिवारिक संस्था में ‘अकोमोडेट’ हो जाता है। मीरां के राजपूत ‘पुनर्वास’ की प्रक्रिया का चरमोत्कर्ष उसको एक आदर्श हिन्दू पत्नी के रूप में चित्रित करने के साथ पूरा होता है। क्योंकि यही छवि बीसवीं सदी के राष्ट्रवादी आन्दोलन में प्रमुखता पाती है। महात्मा गांधी मीरां को सत्य के साथ खड़ी एक आदर्श भारतीय स्त्री कहते हैं तथा आज़ादी के बाद के सिनेमा तथा ‘अमर चित्र कथा’ कॉमिक्स के अंक में मीरां का आदर्श हिन्दू स्त्री और सुशील पत्नी वाला स्वरूप ही प्रमुखता पाता है।

-डॉ. दलपत सिंह राजपुरोहित.

भक्ति के स्त्री-स्वर
नवनीत आचार्य
पृष्ठ : 286
वाणी प्रकाशन
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